आर्यभट्ट से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक: विकसित भारत की ओर गणितीय पथ……
@हिंवाली न्यूज़ ब्यूरो (27 फरवरी 2026)
श्री देव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय, पं. एल. एम. एस. परिसर, ऋषिकेश के गणित विभाग द्वारा दिनांक 26 फरवरी 2026 को “आर्यभट्ट से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक: विकसित भारत की ओर गणितीय पथ” विषय पर एक प्रेरणादायक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय गणित की समृद्ध परंपरा को आधुनिक तकनीकी युग से जोड़ते हुए विकसित भारत के निर्माण में उसकी भूमिका को रेखांकित करना था। कार्यक्रम में भारतीय गणित के महान आचार्य आर्यभट्ट के अद्वितीय योगदानों से लेकर वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग तथा तकनीकी नवाचार में गणित की केंद्रीय भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई। विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता प्रो. सती ने विभाग को इस सफल आयोजन के लिए हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अकादमिक कार्यक्रम विद्यार्थियों में शोध के प्रति रुचि जागृत करते हैं तथा उन्हें राष्ट्र-निर्माण की दिशा में सकारात्मक योगदान देने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने इसे विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।
प्रो. अनीता तोमर, विभागाध्यक्ष, गणित विभाग ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारत की गणितीय विरासत अत्यंत समृद्ध, वैज्ञानिक एवं दूरदर्शी रही है, जिसने न केवल प्राचीन काल में विश्व को ज्ञान प्रदान किया, बल्कि आज भी आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी को दिशा दे रही है। उन्होंने उल्लेख किया कि आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य तथा श्रीनिवास रामानुजन जैसे महान गणितज्ञों ने शून्य, दशमलव पद्धति, बीजगणित, त्रिकोणमिति और अनंत श्रेणियों जैसे सिद्धांतों की स्थापना कर वैश्विक ज्ञान-परंपरा को समृद्ध किया। ये सिद्धांत आज भी आधुनिक गणना-पद्धतियों, अंतरिक्ष अनुसंधान, कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग और डिजिटल प्रौद्योगिकी की आधारशिला बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय गणितीय चिंतन केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य की वैज्ञानिक प्रगति का प्रेरणास्रोत भी है। तर्क, विश्लेषण, परिकलन और खगोल विज्ञान की जो सुदृढ़ पद्धतियाँ भारतीय मनीषियों ने विकसित कीं, उनका प्रभाव आज की आधुनिक तकनीकों—विशेषकर डेटा विश्लेषण, मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता—में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। प्रो. तोमर ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि गणित केवल एक विषय नहीं, बल्कि समस्या-समाधान की सार्वभौमिक भाषा है। यदि युवा शोधार्थी गणित को डेटा साइंस, एल्गोरिद्मिक डिजाइन, क्रिप्टोग्राफी, कम्प्यूटेशनल जीवविज्ञान तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे उभरते क्षेत्रों से जोड़कर अनुसंधान करें, तो वे न केवल नवीन ज्ञान का सृजन करेंगे, बल्कि राष्ट्र के तकनीकी और आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। उन्होंने विशेष रूप से अंतर्विषयी (Interdisciplinary) शोध पर बल देते हुए कहा कि आज की जटिल वैश्विक चुनौतियों—जैसे जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य मॉडलिंग, साइबर सुरक्षा और सतत विकास—का समाधान गणितीय मॉडलिंग और विश्लेषण के माध्यम से ही संभव है। इसलिए विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अनुसंधान-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाएँ, नवीन विचारों को प्रोत्साहित करें और गणितीय चिंतन को व्यवहारिक समस्याओं से जोड़ें। अपने प्रेरक शब्दों में उन्होंने कहा कि यदि युवा वर्ग निरंतर अध्ययन, शोध और नवाचार की दिशा में समर्पित प्रयास करता रहे, तो गणित के माध्यम से भारत को वैश्विक स्तर पर अग्रणी राष्ट्र बनाने का स्वप्न साकार किया जा सकता है। गणित की शक्ति के माध्यम से ही “विकसित भारत” की संकल्पना को मूर्त रूप दिया जा सकता है।
प्रो. दीपा शर्मा ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि भारतीय गणित केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं है, बल्कि यह आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे उन्नत वैज्ञानिक क्षेत्रों की वैचारिक एवं संरचनात्मक नींव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गणितीय तर्कशक्ति, एल्गोरिद्मिक संरचना और संख्यात्मक विश्लेषण आज के डिजिटल युग की आत्मा हैं, जिनके बिना कोई भी आधुनिक तकनीकी प्रणाली सुदृढ़ रूप से विकसित नहीं हो सकती। उन्होंने उल्लेख किया कि आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे महान भारतीय गणितज्ञों ने जिन सिद्धांतों और गणना-पद्धतियों की स्थापना की, वे आज भी आधुनिक संगणन, डेटा विश्लेषण तथा एल्गोरिद्मिक मॉडलिंग की मूलभूत आधारशिला हैं। प्रो. शर्मा ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग जैसे क्षेत्रों का मूल आधार रेखीय बीजगणित, प्रायिकता सिद्धांत, सांख्यिकी, कलन और अनुकूलन सिद्धांत हैं—जो सभी गणित की ही शाखाएँ हैं। मशीन लर्निंग के मॉडल, न्यूरल नेटवर्क की संरचना, डेटा पैटर्न की पहचान तथा भविष्यवाणी-आधारित प्रणालियाँ पूर्णतः गणितीय सिद्धांतों पर आधारित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय गणितीय चिंतन ने सदैव तार्किकता, विश्लेषण और नवाचार को प्रोत्साहित किया है। यही परंपरा आज के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास में भी दिखाई देती है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, साइबर सुरक्षा, फिनटेक, अंतरिक्ष अनुसंधान और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में गणित की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अपने प्रेरक संबोधन में उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे गणित और प्रौद्योगिकी के समन्वय को समझें, अंतर्विषयी शोध की दिशा में आगे बढ़ें और नवीन तकनीकी समाधानों के विकास में योगदान दें। उन्होंने कहा कि यदि युवा पीढ़ी गणितीय ज्ञान को आधुनिक तकनीकी कौशल के साथ जोड़कर कार्य करे, तो वे न केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करेंगे, बल्कि राष्ट्र-निर्माण और “विकसित भारत” की परिकल्पना को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
डॉ. पवन जोशी ने अपने वक्तव्य में कहा कि गणित किसी भी वैज्ञानिक प्रगति की मूल आधारशिला है और यह विषय केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन और तकनीकी विकास का भी प्रमुख साधन है। उन्होंने कहा कि भारत की गणितीय परंपरा ने सदैव तार्किकता, विश्लेषणात्मक सोच और समस्या-समाधान की संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जो आज के नवाचार-आधारित युग में अत्यंत आवश्यक है। डॉ. जोशी ने उल्लेख किया कि प्राचीन भारतीय गणितज्ञों द्वारा विकसित संख्यात्मक पद्धतियाँ, खगोल-गणनाएँ और बीजगणितीय सिद्धांत आज भी आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में डेटा विश्लेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्रिप्टोग्राफी, साइबर सुरक्षा और कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग जैसे क्षेत्रों में गणित की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि गणित को केवल परीक्षा के विषय के रूप में न देखकर, इसे नवाचार और शोध का माध्यम समझना चाहिए। यदि युवा शोधार्थी गणितीय अवधारणाओं को तकनीकी अनुप्रयोगों से जोड़ें, तो वे समाज की जटिल समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। डॉ. जोशी ने अंत में कहा कि गणित हमें अनुशासन, तार्किक दृष्टिकोण और धैर्य सिखाता है। यही गुण एक विकसित राष्ट्र के निर्माण में सहायक होते हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे गणित के माध्यम से शोध-उन्मुख सोच विकसित करें और “विकसित भारत” की परिकल्पना को साकार करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ।
इस अवसर पर शोधार्थी शिवानी नेगी, मनीष प्रकाश तथा प्रियंका पुंडीर ने विषय से संबंधित प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ दीं। उनके व्याख्यानों में प्राचीन भारतीय गणितीय सिद्धांतों और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बीच संबंध को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया। उन्होंने यह दर्शाया कि कैसे पारंपरिक गणितीय विचार आज के उन्नत कम्प्यूटेशनल मॉडल और तकनीकी नवाचारों में उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। उन्होंने प्राचीन भारतीय गणित और आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मध्य संबंध को उदाहरणों सहित तार्किक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से स्पष्ट किया।
विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. एन. के. जोशी ने भी अपने संदेश के माध्यम से संगोष्ठी के सफल आयोजन हेतु शुभकामनाएँ प्रेषित कीं तथा विभाग के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अकादमिक कार्यक्रम विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता को सुदृढ़ करते हैं और विद्यार्थियों को शोध एवं नवाचार की दिशा में प्रेरित करते हैं।
संगोष्ठी में गणित विभाग के सभी शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय उपस्थिति रही। कार्यक्रम के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। अंत में, यह संगोष्ठी विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक सिद्ध हुई तथा उन्हें भारतीय गणित की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम का समापन सकारात्मक एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में हुआ। यह संगोष्ठी भारतीय गणित की गौरवशाली परंपरा और आधुनिक तकनीकी विकास के मध्य एक सशक्त सेतु के रूप में सफल रही।